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Thursday, August 23, 2018

बहुलक तथा उनके उपयोग भाग एक/Polymers and its uses part 1/RAS Mains Paper 2



बहुलक (Polimer)-

जब भी किसी योगिक के छोटे-छोटे सरलतम अणु आपस में मिलकर श्रंखला युक्त बड़े अणु भार वाले यौगिक का निर्माण करते हैं, तो उस प्रक्रिया को बहुलीकरण (polymerisation) कहते हैं।
इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले छोटे-छोटे अणुओं को एक-एक(Monomer) कहा जाता है।

बहूलको को सामान्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

प्राकृतिक बहुलक
संश्लेषित अथवा कृत्रिम बहुलक

प्राकृतिक बहुलक (natural polymer)-

ऐसे बहुलक जिन्हें प्राकृतिक स्रोतों से सीधे तौर पर प्राप्त किया जाता है, प्राकृतिक बहुलक कहलाते हैं।
उदाहरण-स्टार्च, सेल्यूलोस, प्राकृतिक रबड़ आदि।

प्राकृतिक रबर-

प्राकृतिक रबड़ वृक्षों तथा लताओं से प्राप्त होने वाले दूध जिसे रबरक्षीर या लेटेक्स कहा जाता है से निर्मित होता है। यह आइसोप्रीन नामक एक कार्बनिक योगिक के बहुलीकरण से बनता है। इसलिए लेटेक्स में एसिटिक अम्ल मिलाकर इसे ठोस रूप में बदला जाता है।

आइसोप्रीन से पोली आइसोप्रीन का निर्माण-





इस प्रकार प्राप्त होने वाला रबर अत्यंत प्रत्यास्थ तथा कम तन्यता का गुण धारण करता है अतः व्यावसायिक रूप से उपयोगी नहीं होता है।
प्राकृतिक रबड़ की तन्यता को बढ़ाने तथा अप्रत्यास्थ बनाने के लिए इसमें सल्फर मिलाकर गर्म किया जाता है। इस प्रकार सल्फर मिलाकर गर्म करने की प्रक्रिया को रबर का वल्कनीकरण (vulcanization) कहते हैं। इसके पश्चात बनने वाला रबड़ अधिक तन्य अप्रत्यास्थ व कम घिसने वाला होता है।

संश्लेषित अथवा कृत्रिम बहुलक (synthetic polymers)-

प्रयोगशाला में मानव के द्वारा कृत्रिम विधियों से निर्मित बहुलको को संश्लेषित बहुलक कहा जाता है।
संश्लेषित बहुलक कृत्रिम रेशे, प्लास्टिक तथा संश्लेषित रबर के रूप में होते हैं।

कृत्रिम रेशे-यह बहुलक प्राय रेशेनुमा संरचना में होते हैं।
नायलॉन-66, रेयॉन तथा टेरेलीन प्रमुख कृत्रिम रेशम के प्रकार हैं।

नायलान -66 -

यह एडिपिक अम्ल तथा हेक्सामैथिलीन डाई एमीन के संघनन से बनता है। इन दोनों अणुओं में कार्बन के 6-6 परमाणु होते हैं इसीलिए इसे नायलॉन-66 कहा जाता है।
इसका निर्माण निम्न प्रकार से होता है-



नायलॉन के उपयोग

  1. यह मशीनों के गियर तथा बियरिंग बनाने के काम आता है।
  2. टायर, कपड़े, रेशे रस्सियां तथा ब्रश  आदि भी बनाए जाते हैं।
  3. इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स( परावैद्युत गुण) तथा संगीत वाद्य के तंतु बनाने में भी होता है।

टेरीलीन (terylene)-

इस बहुलक को एथीलीन ग्लाइकाल तथा टरथैलिक अम्ल (terephthalic acid) के संघनन द्वारा प्राप्त किया जाता है।
इसका एक अन्य नाम डेक्रान भी है।



टेरीलीन के उपयोग-

टेरीलीन का उपयोग कपड़े, नाव की पाल, चुंबकीय टेप , फिल्में तथा बेल्ट आदि बनाने में किया जाता है।

रेयान-

रेयॉन का निर्माण सामान्य कागज सेल्यूलोज से किया जाता है।
इसमें सेलूलोज को पहले सोडियम हाइड्रोक्साइड के विलियन में भिगोकर साफ किया जाता है। इसके पश्चात कार्बन डाई सल्फाइड में भिगोकर सेल्यूलोज का विलयन प्राप्त किया जाता है। इस सेल्यूलोस विलियम को महीन बारीक छिद्र से निकालकर सल्फ्यूरिक अम्ल में डाला जाता है, जिससे चमकदार रेयान के रेशे प्राप्त होते हैं।

रेयान का उपयोग वस्त्र, धागे तथा दरिया आदि बनाने में किया जाता है।

2 comments:

  1. Bahut hee accha kam h aapka aap nabhikiy technology k senya or asenya upyog batan. Mai aapke channel se taiyari kr rahi hu.or mere pre me 87 marks ban rahe h sab aapke channel k Karen ye ho paya.

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RAS Mains Paper 1

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