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Tuesday, September 18, 2018

स्व एवं व्यक्तित्व की अवधारणा भाग सात /self concept and personality part 7/ RAS MAINS PAPER 3

स्व एवं व्यक्तित्व की अवधारणा भाग सात /self concept and personality part 7/ RAS MAINS PAPER 3



मनोविश्लेषण (psychoanalysis)

मनोविश्लेषण सिगमंड फ्रायड द्वारा विकसित चिकित्सा विज्ञान की परामर्श की एक तकनीक है।
सिगमंड फ्रायड ऑस्ट्रेलिया की एक मनोचिकित्सक थे जिन्होंने अपने चिकित्सा अनुभव के आधार पर इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
इसके अंतर्गत निम्न सिद्धांतों का अध्ययन करेंगे-
मन के स्तर
व्यक्तित्व के उपतंत्र अथवा संरचना
मनोलैंगिक विकास की अवस्थाएं
रक्षात्मक युक्तियां
अध्ययन प्रविधियां

चेतना के स्तर (level of consciousness)-

फ्राइड के अनुसार मन अथवा चेतना के तीन स्तर होते हैं जो कि व्यक्ति के व्यवहार तथा प्रकृति को नियंत्रित करते हैं। यह तीन स्तर निम्न प्रकार हैं-

  • चेतन मन (conscious mind)-इसके अंतर्गत वह चिंतन, भावनाएं अथवा क्रियाएं हैं जिन के प्रति हमारा मन वर्तमान में जागरूक रहता है। वर्तमान समय के एक दिए हुए क्षण में जो कुछ हम सोचते हैं वह चेतन मन के अंतर्गत आता है लेकिन इसके तुरंत बाद वह चेतना कि दूसरे स्तर अर्थात अर्धचेतन मन में चला जाता है।

  • अर्धचेतन मन (subconscious mind)- इसे हम चेतन तथा अचेतन के मध्य एक पुल की भांति मान सकते हैं। इसके अंतर्गत वह अनुभूति विचार तथा भावनाएं होती है जो वर्तमान में तो हमारे चेतन में नहीं होती है लेकिन यदि जरा सा प्रयास करें तो तुरंत चेतन मन में आ जाती है।

  • अचेतन मन (unconscious mind)- अचेतन से तात्पर्य है चेतना से परे। अर्थात इच्छाएं भाव तथा विचार जो अपूर्ण रह जाते हैं वह हमारे अचेतन मन में संग्रहित हो जाते हैं तथा कई बार चेतन में आकर हमारे व्यवहार को प्रभावित करते हैं। अचेतन हमारे मन का सबसे बड़ा हिस्सा होता है जिसमें हमारे बाल्यकाल की अपूर्ण इच्छाएं व मानसिक संघर्ष से जुड़ी यादें संग्रहीत रहती है। यह सभी भावों में कई बार हमारे क्षेत्र में प्रवेश करके व्यवहार को विकृत कर देती है।

व्यक्तित्व की संरचना/ उपतंत्र (subsystem of personality)-

फ्राइड का यह मानना था कि व्यक्ति का व्यवहार व्यक्तित्व के तीन संरचनात्मक उपतंत्रों की अंतर्क्रिया का परिणाम होता है। ये उपतंत्र हमारे अचेतन में ऊर्जा के रूप में होते हैं। यह तीन उप तंत्र निम्न प्रकार हैं-

  • इदम् (ID)- इदम् आत्मसंतुष्टि में विश्वास रखने वाली जन्मजात प्रवृत्ति है। यह व्यक्ति की कामनाओं, आक्रामकता, अनैतिकता तथा नियमों को न मानने से जुड़ा होता है। छोटे बच्चों का व्यवहार इदम् द्वारा ही नियंत्रित होता है। इसकी तुलना आदमी के अन्दर पशु से की जा सकती है क्योंकि इसकी प्रधानता वाले व्यक्ति कार्य करने से पहले परिणाम के बारेे में नहीं सोचते हैं। इड को नैतिक मूल्यों तथा समाज से कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह सुखेप्सा सिद्दान्त पर कार्य करता है।

  • अहम् (IGO) -  जब छोटे बालक की सभी इच्छाएं पूरी नहीं होती है तब उसे धीरे धीरे वास्तविकता का बोध होने लगता है। इससे बालक में अहम् का विकास होने लगता है। अहं धैर्यवान तर्कसंगत तथा वास्तविकता के सिद्धान्त पर कार्य करता है। अहं सामाजिक व नैतिक मूल्यों की परवाह करता है। अहं को एक आदमी के अन्दर आदमी के रूप में समझा जा सकता है।

  • पराहम् (SUPERIGO) - पराहम् को हमारे मानसिक कार्यो की नैतिक शाखा के रूप में जाना जा सकता है। बड़े होते बच्चे समाजीकरण की प्रक्रिया में माता पिता से सही-गलत सम्बन्धी निर्देश प्राप्त करते हैं। निर्देशानुसार कार्य करने पर बालक की प्रशंसा होती है जबकि नियम तोडने पर सजा मिलती है। इस तरह बालक में पराहम् का विकास होता है। पराहम् , अहं को नैतिकता के आधार पर नियंत्रित करता है। हालांकि इसकी वजह से व्यक्ति को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पराहम् को आदमी के अन्दर देवता के रूप में समझा जा सकता है।
इस प्रकार व्यक्ति का अचेतन तीन शाक्तियों से निर्मित होता है तथा इनकी सापेक्ष स्थिति से ही व्यक्ति की स्थिरता निर्धारण होता है।

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