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Friday, September 7, 2018

स्व एवं व्यक्तित्व की अवधारणा भाग दो/self concept and personality part 2/ RAS MAINS PAPER 3



व्यक्तित्व का सम्प्रत्यय (concept of personality)



व्यक्तित्व शब्द लैटिन भाषा के परसोना शब्द से लिया गया है। इस शब्द का तात्पर्य नाटकों में उपयोग किए जाने वाले मुखोटों से हैं।
सामान्यता व्यक्तित्व के निर्धारण के समय हम केवल संबंधित व्यक्ति के बाहरी रूप रंग पर ही गौर करते हैं लेकिन इस प्रकार व्यक्तित्व का निर्धारण करना सही नहीं है। व्यक्तित्व का संपूर्ण निर्धारण करने हेतु यह आवश्यक है कि हम उस के मनोवैज्ञानिक गुणों को भी सम्मिलित करें।

इन मनोवैज्ञानिक गुणों में व्यक्ति का गंभीर होना, बुद्धिमान होना, शांत होना, सहयोगी होना, खुशमिजाज होना, शर्मिला होना आदि गुण सम्मिलित है।

इस तरह व्यक्तित्व को किसी भी व्यक्ति के शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक गुणों का समुच्चय माना जा सकता है। इनमें से व्यक्तित्व में वही गुण सम्मिलित किए जाते हैं जो उसके व्यवहार में स्थाई होते हैं अर्थात जिन गुणों को व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में अनेक बार प्रदर्शित करता है वही उसके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।
हालांकि व्यक्तित्व की कुछ विशेषताएं समय तथा परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनशील भी होती है।

आलपोर्ट ने व्यक्तित्व की परिभाषा निम्न प्रकार दी है-

         " व्यक्तित्व किसी व्यक्ति के मनोशारीरिक तंत्र का वह गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण के साथ उसके प्रभावी समायोजन को निर्धारित करता है।"

व्यक्तित्व के प्रकार-

व्यक्तित्व का वर्णन करते समय अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों  ने विभिन्न प्रकार के पक्षों पर बल दिया है तथा विभिन्न उपागमों की रचना की है। अलग-अलग वैज्ञानिकों द्वारा निम्न प्रकार से व्यक्तित्व का विभाजन किया है।

प्रारूप उपागम
विशेषक अथवा शीलगुण उपागम 
अंतः क्रियात्मक उपागम

प्रारुप उपागम (type approach)

इस उपागम के अंतर्गत लोगों को एक ही प्रारूप में रखा जाता है क्योंकि वे एक जैसी विशेषताएं धारण करते हैं। इस प्रकार अलग-अलग विशेषताएं रखने वाले लोगों को यह उपागम अलग-अलग प्रारूप में रखता है। कुल मिलाकर प्रारूप उपागम में व्यवहारपरक विशेषताओं का परीक्षण किया जाता है। प्रारूप उपागम के कुछ प्रमुख सिद्धांत निम्न प्रकार है-

  1. त्रिगुण सिद्धांत- भारतीय आयुर्विज्ञान के प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता में त्रिगुण के आधार पर व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताए गए हैं-

  • सात्विक- ऐसे लोगों में सत्व की प्रधानता होती है तथा वे इमानदारी, स्वच्छता, सत्यवादिता, कर्तव्य शीलता अनुशासन आदि गुण धारण करते हैं।
  • राजसिक- रजो गुण की प्रधानता होने के कारण ऐसे लोगों में विलासिता से संबंधित गुण यथा तीव्र क्रिया, इंद्रीय तुष्टि की इच्छा, भौतिकवादिता, दूसरों से ईर्ष्या आदि पाए जाते हैं।
  • तामसिक- तम गुण की वजह से यह लोग क्रोध घमंड आलस्य अवसाद आदि गुणों का प्रदर्शन करते हैं।
उपरोक्त सभी गुण प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न मात्रा में मौजूद रहते हैं लेकिन इनमें से किस तत्व की प्रधानता होती है व्यक्ति उसी के अनुरूप व्यवहार प्रदर्शित करता है।


  1. शेल्डन का व्यक्तित्व सिद्धांत-

1940 के दशक में मनोवैज्ञानिक शेल्डन द्वारा व्यक्तित्व के प्रकारों को शारीरिक बनावट व स्वभाव से जोड़कर यह सिद्धांत दिया गया। उन्होंने इन व्यक्तित्व के प्रकारों को सोमेटोटाइप तीन श्रेणियों में विभाजित किया है-

  • गोलाकृतिक (endomorphic)- इस व्यक्तित्व वाले लोगों की शारीरिक बनावट में गोल मटोल शरीर, ठिगना कद, शरीर पर अधिक वसा आदि विशेषताएं होती है। यह लोग शिथिल, सामाजिक, हास्यपसन्द तथा मिलनसार तथा बहिर्मुखी होते हैं।
  • लंबाकृतिक (ectomorphic)- ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग कद में लंबे, पतले पैरों वाले, संकीर्ण चेहरे व छाती युक्त शरीर लिए होते हैं। ये शांत स्वभाव के, कम मिलनसार, कलात्मक, कुशाग्र बुद्धि वाले एवं अंतर्मुखी होते हैं।
  • आयताकृतिक (mesomorphic)- इस प्रकार के लोग आकर्षक एवं सुगठित शरीर, मजबूत पेशियों से युक्त होते हैं। ये ऊर्जावान, साहसी दृढ़, निडर तथा प्रतिस्पर्धा की भावना रखने वाले होते हैं। ये जीवन में जोखिम तथा संभावनाओं को लेना पसंद करते हैं।




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