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Sunday, April 8, 2018

जैव प्रौद्योगिकी भाग -2/ Biotechnology part 2/RAS Prelims & Mains Paper 2

जैव प्रौद्योगिकी भाग -2/ Biotechnology part 2/RAS Prelims & Mains Paper 2

पिछले भाग में हमने जैव प्रौद्योगिकी तथा उसके विभिन्न प्रयोगों के बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इस भाग में हम मानव जीनोम परियोजना के बारे में बात करेंगे। 

मानव जीनोम परियोजना-

जीन सभी प्राणियों की मूलभूत इकाई है जिसमे जीवन के सभी रहस्य छिपे हुए है। मनुष्य के शरीर में लाखो कोशिकाएं होती है।
गुणसूत्रों से हमारे जीवन के प्रत्येक गुण व कार्य का निर्धारण होता है।
इन गुणसूत्रों में उपस्थित प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल से निर्मित डीएनए में हजारो लाखो जीन होते है जो मिलकर जीनोम का निर्माण करते है।
 यदि इस जीनोम का अध्ययन कर लिया जाए तो मानव जीवन की सभी जैविक लक्षणों व गुणों का पहले से पता लगाया जा सकता है। 

मानव जीनोम परियोजना एक वैज्ञानिक परियोजना है जो मनुष्य में जीनोम के अनुक्रम का पता लगाने के लिए शुरू की गई थी।
 इसकी शुरुआत अमरीका के ऊर्जा विभाग तथा नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ द्वारा सन 1988 (औपचारिक शुरुआत 1990)  में की गई थी जिसका पहला चरण HGP-READ 2003 में पूरा हुआ है। इसपर लगभग 2.7 अरब डॉलर का खर्च हुए है।इसमें अट्ठारह देशो को लगभग 250 प्रयोगशालाएं सम्मिलित है।


HGP -READ के प्रमुख उद्देश्य-

 इसका प्रमुख उद्देश्य मानव जीनोम को पढ़ना अर्थात डिकोड करना है। 

 मानव डीएनए में उपस्थित लगभग एक लाख जीनो की पहचान करके उनमे उपस्थित तीनसौ करोड़ क्षारक युग्मो का निर्धारण करना। 

 प्रत्येक कोशिका के गुण सूत्र में, उपस्थित डी एन ए के चार क्षारकों का अनुक्रम पता लगाना ही, मानव जीनोम परियोजना का मुख्य उद्देश्य है।

 इन सूचनाओं के संग्रहण तथा उनका रोगो में इलाज के लिए उपयोग के मार्ग तलाशना। 

इस परियोजना के दूसरे चरण का प्रस्ताव 2016 में रखा गया जिसे HGP-WRITE के नाम से जाना जाता है। इसमें प्रथम चरण से प्राप्त DNA ब्लूप्रिंट तथा अन्य जानकारी का विश्लेषण कर चिकित्सकीय क्षेत्र में उपयोग की सम्भावनाओ को तलाशा जायेगा। 
इस योजना के द्वारा विभिन्न असाध्य रोगो जैसे की कैंसर, एड्स आदि के इलाज के लिए रोगी के जैव ब्लूप्रिंट का प्रयोग किया जायेगा तथा रोग के कारक अनुक्रम पता लगाकर उसमे सुधार करके रोग के निदान के प्रयास किये जायेंगे। 

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग (प्रोफाइलिंग)-

जिस प्रकार से प्रत्येक मनुष्य की अंगुलियों पर विशेष तथा अद्वितीय उभार होते है उसी तरह से मानव जीवन का आधार पदार्थ डीएनए भी एक विशिष्ट गुणों तथा पैटर्न से युक्त रसायन होता है।
एक ही परिवार के लोगो मे डीएनए पर उपस्थित जीन आपस मे समानता रखते है चाहे बाहर से वे कितने ही अलग क्यो न हो। 
एक ही प्रजाति के लोगो मे पहचान ढूंढने के लिए डीएनए के प्रयोग की तकनीक को ही डीएनए फिंगरप्रिंटिंग कहते है। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग अनुवांशिक विज्ञान की देन है। 
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग में केवल रक्त की बूँद, वीर्य त्वचा दांत या एक कोशिका से भी डीएनए निकलकर इस प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है। 

डीएनए के बहुत से भागो का एक साथ अध्ययन डीएनए फिंगरप्रिंटिंग कहलाता है जबकि केवल डीएनए के एक ही भाग का अध्ययन किया जाता है तो इससे डीएनए टाइपिंग कहा जाता है। 

भारत तीसरा ऐसा देश है जहा पूर्णतया स्वदेशी डीएनए फिंगर प्रोब का विकास किया गया है। यह सब हैदराबाद में स्थित कोशिकीय तथा आणविक जीवविज्ञान केंद्र (CCMB) द्वारा किये गए शोध से ही संभव हो पाया है। 
ब्रिटिश वैज्ञानिक एलेज जेफ्रेज ने सर्वप्रथम 1983 में  इस तकनीक का विकास किया था। 

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के उपयोग-

रक्षा क्षेत्र में-
युद्ध अथवा दुर्घटना में मृत व्यक्तियों की पहचान करने के लिए। 

अपराधियों की पहचान करने में -
इस क्षेत्र में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के उपयोग को फॉरेंसिक बायोटेक्नोलॉजी कहा जाता है। इसके अंतर्गत हत्या , बलात्कार जैसे अपराधों में अपराधी की सटीक पहचान की जा सकती है। 

न्यायिक तथा पारिवारिक मामलो में-
सम्पत्ति उत्तराधिकार तथा विवाह के सम्बन्धी मामलो में माता पिता तथा पुत्र की सही पहचान करने में इसका प्रयोग किया जाने लगा है क्योकि संतान में डीएनए उसके माता तथा पिता दोनों से प्राप्त होता है। 

चिकित्सा के क्षेत्र में -
चिकित्सा के क्षेत्र में गर्भ में ही भ्रूण के डीएनए का परीक्षण करके सम्बंधित जन्मजात तथा अनुवांशिक बीमारियों का पता लगाया जा सकता है व सही समय पर निदान भी किया जा सकता है। 

कृषि बागवानी तथा पशुओ की नस्ल सुधारने में भी इस विधि का प्रयोग किया जा रहा है। 

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