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Monday, March 12, 2018

दायित्व (Liability)/RAS Mains paper 3

दायित्व का सीधा सम्बन्ध व्यक्ति द्वारा किये गए अपकार अथवा विधि के उल्लंघन से है।  विधि शास्त्र दायित्व को एक प्रकार का 'न्याय बंधन ' मानता  है।
जब कभी मनुष्य किसी विधिक कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ सिद्ध होता है तब उसके दायित्व की उत्पत्ति होती है।

विधिवेत्ता सामंड  के अनुसार '' दायित्व एक ऐसा बंधन है जो अपकृत्य करने वाले तथा उसके द्वारा किये गए अपकार के उपचार के बीच उपस्थित होता है। ''
राज्य की प्रभुता शक्ति दायित्व का प्रवर्तन करने में सक्षम होती है।
विडियो ट्यूटोरियल


दायित्व के प्रकार -सामंड ने दायित्व के निम्न प्रकार बताये है -

सिविल दायित्व -
यह दायित्व दीवानी मामलो की कार्यवाही से सम्बंधित है जिसमे प्रतिवादी के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए वादी के जिस अधिकार का उल्लंघन हुआ है,  उसका प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाता है।

आपराधिक दायित्व-
आपराधिक मामलो के अंतर्गत किये गए अपराध के लिए अपराधी को दण्डित करने से सम्बंधित कार्यवाही आपराधिक दायित्व कहलाती है।

उपचारात्मक दायित्व-
जब कभी किसी कानून का निर्माण होता है तो उसके साथ कुछ कर्तव्यों का भी सृजन होता है। इसके साथ ही कर्तव्यों का निर्दिष्ट पालन न होने की दशा में क्षतिपूर्ति का प्रावधान भी उस कानून के अंतर्गत किया जाता है।
उपचारित दायित्व की वजह से ही अपकारी (गलत कृत्य करने वाला) कानून के अंतर्गत क्षतिपूर्ति के किये बाध्य होता है। उपचारित दायित्व के अंतर्गत राज्य अपनी प्रभुता शक्ति का इस्तेमाल करके कानून का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन करने में सक्षम होता है।
इसके कुछ अपवाद भी है जो निम्न है -
  1. किसी अपूर्ण कर्त्तव्य का अनुपालन नहीं करने पर कानून के अंतर्गत उपचारित दायित्व नहीं माना जा सकता है। 
  2. ऐसे कर्तव्य जिनका विनिर्दिष्ट अनुपालन करना संभव नहीं होता है। उदाहरण- यदि किसी व्यक्ति द्वारा चोरी की जा चुकी हो तो उस व्यक्ति से चोरी न करने के कर्तव्य का अनुपालन करवाना संभव नहीं है। 
  3. कई कर्तव्य ऐसे होते है जिनका प्रवर्तन संभव होते हुए भी परिस्थिति के अनुसार वह उचित नहीं होता है। उदाहरण-विवाह विच्छेद सम्बन्धी मामलो में दोनों पक्षों में विवाह के प्रति वचनबध्दता होते हुए भी क्षतिपूर्ति दिलाना ही उचित माना  जाता है। 
शास्तिक दायित्व-
शास्तिक दायित्व दो प्रमुख शर्तो पर निर्भर करता है -
  1. किसी अपकृत्य का भौतिक रूप से घटित होना। 
  2. अपकारी के मन में कृत्य को करने की भावना अथवा आशय होना। 
शास्तिक दायित्व तभी आरोपित किया जा सकता है जब अपराधी कानून के विरुद्ध कोई कृत्य करता हो व इसके साथ साथ उसके मन में उसे करने की भावना भी रही हो। चाहे व्यक्ति का आशय कितना भी दोषपूर्ण क्यों न हो बिना कृत्य किये उसे दोषी नहीं माना जा सकता है। 

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