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Wednesday, March 21, 2018

जैव प्रौद्योगिकी भाग एक/ Biotechnology part 1/RAS Prelims & Mains Paper 2

जैव प्रौद्योगिकी भाग एक/ Biotechnology /RAS Prelims & Mains Paper 2
 
विज्ञान के नियमो तथा तकनीक का उपयोग करके सजीव पदार्थो से मानव उपयोगी पदार्थो तथा सेवाओ का सृजन जैव प्रौद्योगिकी के अंतर्गत आता है।

यह जीव विज्ञान तथा अभियांत्रिकी का मिला जुला रूप है।
 
मानव प्राचीन काल से ही किण्वन के माध्यम से शराब, पनीर तथा दही आदि का उत्पादन करके जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करता आ रहा है।

आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की शुरुआत 1950 से डीएनए तथा जीन अभियांत्रिकी पर रीसर्च के साथ हुई।
 
भारत में डॉ हरगोविंद खुराना ने 1973 में जीन संश्लेषण का सफल प्रयोग करके भारत में इस क्षेत्र की संभावनाएं पैदा की।
 
वर्तमान में जैव प्रौद्योगिकी का स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, ऊर्जा तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भरपूर उपयोग हो रहा है।
 
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जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग-
 
चिकित्सा तथा स्वास्थ्य-
 
इसकी सहायता से सस्ती औषधियों के निर्माण, प्रतिरोधी टीको, असाध्य बीमारियो के इलाज, उन्नत किस्मो के प्रजनन, अंगों के पुनर्विकास के लिए स्टेम सेल का प्रयोग आदि क्षेत्रो में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
कैंसर तथा एड्स जैसी बीमारी का भी इलाज जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से करने की कोशिश की जा रही है।
जीन चिकित्सा द्वारा पार्किंसन कैसे वंशानुगत रोगों का इलाज किया जा सकता है।
जीन अंतरण के द्वारा इन्सुलिन का उत्पादन मधुमेह के रोगियों के लिए वरदान साबित हुआ है।
 इसे लाल जैव प्रौद्योगिकी कहा जाता है।
 
कृषि-
 
वर्तमान में बढ़ती हुई जनसँख्या तथा संसाधनों की कमी को देखते हुए कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का महत्व बढता जा रहा है।
ट्रांसजेनिक फसलों का प्रयोग करके काम लागत में उच्च गुणवत्ता युक्त खाद्य उत्पादों का उत्पादन किया जा सकता है जो तापरोधकता, कीट सहिष्णुता, शुष्कता रोधी आदि गुणों से भरपूर हो।
जीन अभियांत्रिकी से वांछित पोषक तत्वों को खाद्य पदार्थो से प्राप्त किया जा सकता है जो विकासशील देशों में गरीबी तथा कुपोषण से लड़ने में सहायक हो सकते है।
बायोफोर्टिफिकेशन का उपयोग करके फसल में वृद्धि के दौरान ही उसमे पोषक तत्वों में सुधार किया जा सकता है।
रोग प्रतिरोधी तथा दुधारू पशुओं की नस्लो के प्रजनन में भी जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग हो रहा है।
 इसे हरित जैव प्रौद्योगिकी कहा जाता है।
 
औद्योगिक क्षेत्र में-
 
उद्योगों में आवश्यक विभिन्न आवश्यक पदार्थो का उत्पादन तथा ईंधन का उत्पादन जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से संभव हो सका है।
विभिन्न अम्लों, प्रोटीन , विटामिन स्टेरॉयड तथा एंटी बायोटिक्स का वृहद स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है। इसे व्हाइट अथवा ग्रे बायो टेक्नोलॉजी कहा जाता है।
विभिन्न जीवाणुओं से उत्पन्न जैव ईंधन जिसमे शर्कराओं से उत्पादित बायो एथेनॉल तथा जेट्रोफा, सरसो,  सोया आदि के ट्रांसऐस्ट्रिफिकेशन द्वारा निर्मित बायो डीज़ल में भी जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग होता है।
 
पर्यावरण संरक्षण-
 
बायोरेमेडिएशन वह तकनीक है जिसमे सूक्ष्मजीवों अथवा एंजाइमो का प्रयोग अपशिष्ट प्रबंधन में किया जाता है। ऑयल जैपर इसका एक उदाहरण है जो तेल रिसाव को नियंत्रित करने में काम आता है।
 
भारत में जैव प्रौद्योगिकी का क्षेत्र-
 
विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन जैव प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना 1986 में की गयी थी जो की इसकी नोडल एजेंसी है।
भारत में वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी उद्योग का 2 % हिस्सा है तथा हम शीर्ष बारह देशो में से एक है।
भारत में औषधि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी का सर्वाधिक विकास हुआ है।
भारत में नियामक कानूनों के अभाव में  SRA अर्थात वैज्ञानिक जोखिम आकलन एक कठिन कार्य है।
जनता में जागरूकता का अभाव तथा वित्तीय संसाधनों की कमी से भी यह क्षेत्र झूझ रहा है।

1 comment:

  1. bahut acche science ke notes hai especialy mujhe kaam a rahe hai RAS mains ke liye
    ras junction blogger ke designing ke releted koi query ho to meri help lijiye Thanks mrdgour2@gmail.com

    Dharmendar Gour
    Web Designer ( Blog Design )

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RAS Mains Paper 1

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