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Sunday, November 12, 2017

लोक प्रशासन के सिद्धान्त :व्यवस्था उपागम/lok prashashan ke sidhant

इस सिद्धान्त का आरम्भ 1920 में जीव वैज्ञानिक लुडविक वॉन बर्टलेम्फी ने की थी। यह सिद्धांत किसी भी संगठन को एक व्यवस्था के रूप में देखता है।
बर्टलेम्फी के अनुसार, " व्यवस्था, अन्तरक्रियाओ में निहित तत्वों का समूह है।"
व्यवस्था उपागम सिद्दान्त के अनुसार "व्यवस्था" को प्रशासन का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।
हाल व फैगन के अनुसार, " वस्तुओं के गुणों व उनके मध्य पारस्परिक सम्बन्धों के सामुहिक रुप को व्यवस्था कहते है।"
 साधारण रूप में किसी संगठन के कार्मिक, संसाधन, उत्पाद, प्रक्रिया आदि  अलग अलग भाग हो सकते है लेकिन ये सब मिलकर एक व्यवस्था का निर्माण करते है। 

सामान्यतः व्यवस्थाएँ दो प्रकार की होती है-

  1. खुली व्यवस्था- ऐसी व्यवस्था जिसके विभिन्न घटक पूर्ण रूप से बाह्य वातावरण पर निर्भर करते है तथा जिनका अस्तित्व भी वातावरण से प्रभावित होता है, उसे खुली व्यवस्था कहते है। सभी जीवित प्राणी, पेड पौधे तथा मानवीय संगठन खुली व्यवस्थाए है।
  2. बन्द व्यवस्था- इस व्यवस्था में वाह्य वातावरण से कोई क्रिया नहीं होती है। सभी प्रक्रियाएँ आन्तरिक नियंत्रण के अन्तर्गत कार्य करती है।

व्यवस्था उपागम की विशेषताएँ -

  1. व्यवस्था उपागम प्रबन्धन के विभिन्न पहलुओं को एक ही व्यवस्था के रूप में देखता है।
  2. प्रत्येक व्यवस्था अनेक भागों में विभाजित रहती है। प्राय संगठनों में अलग अलग प्रभागों का निर्माण इसीलिए किया जाता है।
  3. ये सभी भाग एक दूसरे पर निर्भर रहकर कार्य करते है तथा एक साथ मिलकर व्यवस्था का निर्माण करते है।
  4. खुली व्यवस्था अपने वातावरण से अन्तर्क्रिया करती है अतः उससे प्रभावित भी होती है। हालांकि बन्द व्यवस्था के मामले में ऐसा नही होता है।
  5. व्यवस्था सदैव गतिशील अवस्था में बनी रहती है।
  6. व्यवस्था इनपुट तथा आउटपुट के सिद्धांत पर कार्य करती है। 

व्यवस्था उपागम की आलोचना  -

  1. व्यवस्था उपागम अलग अलग व्यवस्थाओ में स्पष्ट भेद नहीं करता है। 
  2. यह एक जटिल उपागम है। 
  3. यह व्यवस्था के विभिन्न भागो में अन्तरक्रिया को भी स्पष्ट नहीं कर पता है।
  4. इस उपागम में सार्वभौमिकता का आभाव है।   

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