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Thursday, November 2, 2017

मेवाड़ शैली राजस्थानी चित्रकला -भाग 2 (RAS MAINS PAPER 2

 
  • मेवाड़ शैली को राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली माना जाता है।  इसके विकास का श्रेय महाराणा कुम्भा को जाता है। 
  • इस शैली का प्राचीनतम ग्रन्थ 1260  ई  के ''श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि'' को माना गया है। इसे चार उपशैलियो में विभाजित किया गया है -

उदयपुर शैली -

     
  • यह शैली उदयपुर व आसपास के क्षेत्र से सम्बन्धित  है। 
  • महाराजा जगत सिंह के समय इस शैली का उदभव माना  गया है। ''श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि'' व ''सुपासनाहचरित'' इसी शैली के चित्रित ग्रन्थ है। 
  • इस शैली में पीले व लाल रंग का प्रमुखता से प्रयोग किया गया है। 
  • साहिबदीन, गंगाराम, कृपाराम व मनोहर आदि प्रमुख चित्रकार है। 
  • पुरुषों का छोटा कद, लम्बी मूछे , विशाल नयन, सर पर पगड़ी तथा स्त्रियों की मीन जैसी आँखे, लम्बी नाक, लहंगा व ओढ़नी आदि प्रमुख विशेषताएँ  है। 
  • ''चितेरों की ओवरी'' विद्यालय का निर्माण जगत सिंह प्रथम ने करवाया था जिसे ''तसवीरां रो कारखानों'' के नाम से भी जाना जाता है। 

नाथद्वारा शैली -

     
  • यह शैली नाथद्वारा में श्रीनाथ जी व आसपास के क्षेत्र से सम्बन्धित  है। अधिकतर चित्र कृष्ण लीला को समर्पित है। 
  • महाराजा राज सिंह के समय इस शैली का उदभव माना  गया है। 
  • इस शैली में पीले व हरे रंग का प्रमुखता से प्रयोग किया गया है। 
  • घासीराम, नारायण, चतुर्भुज व उदयराम आदि इस शैली के प्रमुख चित्रकार है। 
  • पिछवाई कला इसी शैली का भाग है। श्रीनाथ जी के मंदिर में  कपडे पर पर की जाने वाली चित्रकारी विश्व प्रसिद्ध है। 
  • गोपियों, ग्वाल बालो, गाय व केले के वृक्ष आदि को प्रमुखता से चित्रित किया गया है। 

देवगढ़ शैली-

     
  • यह राजसमंद के देवगढ़ ठिकाणे की शैली है जिसका उद्भव रावत द्वारिका दास चुण्डावत के समय 1680 में हुआ था। 
  • इस शैली के प्रमुख चित्रकार बैजनाथ, चोखा व कवँला है। 
  • इस शैली में राजसी व प्राकृतिक दृश्य, शिकार, आदि का चित्रण हुआ है जिसमे पीले रंग का बहुलता से प्रयोग है। 

चावण्ड शैली-

     
  • महाराणा प्रताप के चावण्ड  को राजधानी बनाने के बाद इस शैली का उद्भव हुआ था। अमर सिंह के काल में इस शैली का विकास हुआ। 
  • निसारदी इस  शैली के प्रमुख चित्रकार थे। 
  • रंगमाला प्रमुख चित्रित ग्रन्थ है। 

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